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महाभारत में एक प्रसंग आता है कि प्रह्लाद जी के पुत्र विोचन और एक ऋषि अंगीरा पुत्र इन दोनों का किसी बात पर विवाद हो गया....

महाभारत में एक प्रसंग आता है कि प्रह्लाद जी के पुत्र विोचन और एक ऋषि अंगीरा पुत्र इन दोनों का किसी बात पर विवाद हो गया। विवाद किस बात का था? दोनों ही अपना अध्ययन पूर्ण कर चुके थे। समावर्तन संस्कार हो चुका था। अब दोनों ही गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहते थे। विोचन भी और अंगीरा महर्षि के पुत्र भी और एक कन्या दैत्य कन्या उस कन्या से वे ऋषि कुमार भी विवाह करना चाहते थे केशनी नाम था परम सुंदरी थी पद्मगंधा थी अंगीरा पुत्र भी उससे विवाह करना चाहते थे।


तो विोचन ने कहा अंगीरा पुत्र से कि मैं मेरे पिता इस संपूर्ण भूमंडल के सम्राट हैं। परम भक्त हैं प्रह्लाद जी महाराज। मैं दैत्य कुलोतन दैत्य कुल भूषण हूं। ज्ञान में वेद पाठ में किसी बात में बल में ओज में तेज में तुमसे किसी बात में कम नहीं हूं। इसलिए मैं तुमसे श्रेष्ठ हूं। इस कन्या से विवाह मैं ही करूंगा। उन्होंने कहा मेरे पिता महर्षि अंगीरा साक्षात ब्रह्मा जी के पुत्र हैं। उनका मुख से प्राकट हुआ है। वे मानसी सृष्टि में हैं। तपस्वी अकिंचन ऋषि हैं। वे राजा महाराजा तो नहीं है। पर वे तपोधन है और मैं ऐसे महान तपस्वी का पुत्र हूं। इसलिए मैं तुमसे श्रेष्ठ हूं। दोनों अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित कर रहे थे। तो बोले चलो फैसला कराओ। प्रह्लाद जी के दरबार में फैसला पुत्र का विवाद और ऋषि पुत्र का विवाद दोनों का विवाद वहां पहुंचा। प्रह्लाद जी से कहा निर्णय करो। शर्त यह है यदि विोचन ने कह दिया यदि तुम हमसे श्रेष्ठ सिद्ध हुए तो मेरे प्राण तुम्हारे अधीन होंगे। मुझे अपने प्राण देने पड़ेंगे। ठीक है। अंगीरा पुत्र ने भी कह दिया तुम मुझसे श्रेष्ठ सिद्ध हुए तो मैं अपने प्राण विसर्जित कर दूंगा। प्राणों की बाजी लगा। प्रह्लाद जी के पास गए।

ऋषि पुत्र ने कहा देखो प्रह्लाद जी आप भगवान के भक्त हैं। मैं आपको विोचन का पिता मानकर न्याय लेने नहीं आया हूं। आपको आप पुरुष मानकर के आपके दरबार में न्याय लेने आया हूं। आप न्याय करो। अब प्रहलाद जी के एकमात्र पुत्र हैं विोचन। प्रह्लाद जी बड़े धर्म संकट में पड़ गए कि श्रेष्ठ तो यही है। पर मैं कहता हूं कि यह श्रेष्ठ तो मेरा पुत्र तो मेरे हाथ से चला गया। इसके तो प्राण चले जाएंगे। तब उन्होंने कहा कि ठीक है। हम अपने पिताजी से पूछ के आते हैं। आप लोग बैठो।

तो अपने पूर्वजों से पूछ के आते हैं। बाबा से पूछ के आते हैं। तो प्रह्लाद जी अपने पितामह कश्यप जी के पास गए। बोले बाबा ऐसी ऐसी समस्या है। यह नहीं पता झगड़ा क्या है? बोले ऐसा फैसला आया है। उसमें मुझे क्या करना चाहिए? तो उन्होंने कहा कि जिसे आप पुरुष मान करके न्याय के लिए कहा गया यदि वह रागाद के अधीन होकर के अपने आप पुरुषत्व सेत होता है तो उसे चतुर्दश इंद्रों की आयु तक नरकगामी होना पड़ता है। इसलिए पंचायत आवे तो फैसला सही न्यायोचित करना चाहिए। उसमें अपने पराए का भेद नहीं करना चाहिए। इसलिए तुम यदि मुझसे पूछने आए हो तो हानि लाभ का विचार मत करो। अपने पराए का विचार मत करो। जो सही हो वेद शास्त्र आदि से सम्मत हो वही फैसला दो। और आकर उन्होंने फैसला दिया। महाराज जी प्रह्लाद जी ने प्रह्लाद जी ने कहा कि मेरे शरीर का पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप और इनके शरीर का जनक महर्षि अंगीरा तो मेरे पिता से इस ऋषि कुमार का पिता श्रेष्ठ है। मेरे पिता से इसका पिता श्रेष्ठ है। ठीक इसी प्रकार से मेरी माता से इसकी माता श्रेष्ठ है। तो तुम्हारे पिता से इनके पिता श्रेष्ठ हैं। अपने पुत्र से कहा और तुम्हारी माता से इनकी माता श्रेष्ठा है। तो फिर तुम इससे श्रेष्ठ नहीं हो सकते हो। तुम इससे कनिष्ठ ही रहोगे। इसलिए उस कन्या पर अधिकार इसी ब्राह्मण कुमार का है। तुम्हारा नहीं है। तुम वहां से मन को हटा लो। और तुम्हें मरणांत प्रायश्चित करना पड़ेगा। अब मेरे पुत्र के प्राण हे ऋषि नंदन तुम्हारे अधीन है। इतना सुनते ही महर्षि अंगरा के पुत्र ने विोचन को हृदय से लगा लिया। कहा आपके इस न्याय से हम संतुष्ट हैं और हम आपके पुत्र को आयु दान करते हैं। प्राण दान करते हैं। 

तो प्रह्लाद जी ने कहा देखो यदि तुम्हारे पक्ष में फैसला जाता तो तुम इसके प्राण ले लेते। तुम्हारे मन में दया नहीं आती। पर यह ब्राह्मण है। इसका हृदय पिघल गया। इसके मन में दया का भाव आ गया। इसलिए प्रमाणित हो गया कि तुमसे यह कई गुना श्रेष्ठ है। तो विोचन ने ऋषि कुमार के चरण पकड़ लिए। झूठे मूठे मनगढ़ंत इतिहास लिखने वाले लोगों की बातें प्रमाण नहीं होती है। प्रमाण होती हैं। आप पुरुषों की बातें आप वाक्यम प्रमाणम। आप पुरुषों के वचन प्रमाण होते हैं। और आप कौन है? भैया इन संतों से बढ़कर कोई आप नहीं है। इन संतों में अपने पराए का भेद होता ही नहीं है। जीव जगत के परम हित की परम कल्याण की जो बात होती है वही वे कहते हैं। उनमें न कोई आग्रह होता है और दुराग्रह तो उनमे होता ही नहीं। इसलिए बोले कि आज के मनगढ़ंत झूठे मूठे इतिहास लिखने वाले उन्होंने इतिहास में भले ही ना लिखा हो लेकिन हम मानते हैं सारा संसार मानता है क्यों बोले विदित बात विदित बात संसार संत मुख कीर्ति गावे संत सब कीर्ति गावे यह भी कह सकते थे लेकिन संत सब कीर्ति गावे ना कह के कहा संत मुख कीर्ति गावे इसका मतलब है कि श्री स्वामी हरिव्यास देवाचार्य जी के गुण उनका दिव्य मंगलमय चरित्र संतों के हृदय में ऐसा बस गया कि उनके मुख से जब वाणी निकलती तो कहते भैया भजन तो ऐसा होना चाहिए जैसो हमारे आचार्य चरण श्री हरिव्यास देवाचार्य जी की हो के देवी उनकी शिष्या है तो संत मुख कीर्ति गावे ऐसा होता है।

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