असितांग भैरव: स्वरूप और रहस्य
अष्ट भैरवों के समूह में 'असितांग भैरव' प्रथम स्थान पर विराजमान हैं। 'असित' का अर्थ है काला और 'अंग' का अर्थ है शरीर। अर्थात, जिनका अंग (शरीर) घोर अंधकार के समान काला है, वे असितांग हैं। तंत्र शास्त्रों में उन्हें सृष्टि क्रम का भैरव माना जाता है, क्योंकि वे ब्रह्मा की शक्ति 'ब्रह्माणी' के साथ विचरण करते हैं।
दिशा: पूर्व (East)
तत्व: यह स्वरूप वायु और आकाश तत्व का मिश्रित रूप माना जाता है (बौद्धिक विस्तार)।
वाहन: हंस (सामान्यतः भैरव का वाहन श्वान होता है, परंतु असितांग भैरव का वाहन हंस है, जो विवेक और कला का प्रतीक है)।
शक्ति (संगिनी): ब्रह्माणी।
ग्रह: बृहस्पति (Jupiter) - कुछ मतों में यह शुक्र को भी नियंत्रित करते हैं (कला के कारण)।
मुख्य गुण: रचनात्मकता, शाप मुक्ति, और वाक सिद्धि।
विभिन्न तंत्र संप्रदायों में असितांग भैरव
1. कौल मार्ग (कौल संप्रदाय) - कौल मार्ग में असितांग भैरव को 'इच्छा शक्ति' का स्वरूप माना जाता है। कौल साधक इन्हें हृदय चक्र और विशुद्धि चक्र के बीच की कड़ी मानते हैं।
मत: कौल आचार्यों के अनुसार, जब साधक की कुंडलिनी जागृत होने लगती है, तो सबसे पहले असितांग भैरव ही उसे 'सुषुम्ना' मार्ग में प्रवेश की अनुमति देते हैं।
साधना: यहाँ इनकी साधना में 'पंचमकार' का उपयोग सात्विक या राजसिक रूप में (प्रतिनिधि द्रव्यों द्वारा) किया जाता है, जिसमें मुख्य उद्देश्य 'सृजन' (Creation) होता है।
2. अघोर संप्रदाय - अघोरियों के लिए असितांग भैरव 'श्मशान' के द्वारपाल हैं जो पूर्व दिशा से रक्षा करते हैं।
मत: अघोर मत में, असितांग भैरव वह शक्ति हैं जो साधक के मन से 'सीमित बुद्धि' (Limited Intellect) को जलाकर उसे 'असीमित चेतना' देते हैं। चूंकि इनका वाहन हंस है, अघोरी मानते हैं कि यह भैरव अशुद्ध में से भी शुद्ध को ग्रहण करने की विद्या (नीर-क्षीर विवेक) प्रदान करते हैं।
क्रिया: अघोर पंथ में इनकी साधना प्रायः नदी के किनारे (शमशान के पास बहती नदी) पर की जाती है।
3. नाथ संप्रदाय - नाथ योगी इन्हें सिद्धियों का दाता मानते हैं। विशेषकर 'खेचरी मुद्रा' और 'शांभवी विद्या' में सफलता के लिए असितांग भैरव की कृपा अनिवार्य मानी गई है।
साधना विधान (Sadhana Vidhi) - इस साधना को करने से साधक को अद्भुत कल्पनाशक्ति, कला में निपुणता और किसी भी प्रकार के पुराने शाप (Curse) से मुक्ति मिलती है।
साधना का समय और स्थान:
समय: कालाष्टमी (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), रविवार की रात्रि, या ग्रहण काल।
स्थान: एकांत कक्ष, शिवालय, या नदी का किनारा (नदी तट सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि हंस जल का प्रतीक है)।
वस्त्र: साधक को काले या गहरे नीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए।
दिशा: पूर्व (East) की ओर मुख करके बैठें।
पूजन सामग्री:
काले उड़द, सरसों के तेल का दीपक (चार मुखी हो तो उत्तम), धतूरा, सफेद फूल (हंस प्रतीक के कारण), मदिरा (ताम्र पात्र में, केवल अर्पण हेतु), और नैवेद्य में खीर या उड़द के बड़े।
1. विनियोग (संकल्प) - हाथ में जल लेकर बोलें: “ॐ अस्य श्री असितांग भैरव मंत्रस्य, ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्री असितांग भैरव देवता, ह्रीं बीजं, हुं शक्तिः, मम अभिलषित कार्य सिद्धर्थे जपे विनियोगः।” (जल भूमि पर छोड़ दें)
2. ध्यान (Dhyana) - आँखें बंद करके असितांग भैरव के स्वरूप का ध्यान करें: त्रिनेत्रं वरदं शान्तं, कुमारं च दिगम्बरम्। गायत्रीं जरया युक्तं, असितांगं भजेऽहम॥
(भावार्थ: जो तीन नेत्रों वाले हैं, वरद मुद्रा में हैं, शांत किन्तु उग्र स्वरूप, दिगंबर हैं और ब्रह्माणी शक्ति के साथ सुशोभित हैं, उस असितांग भैरव को मैं भजता हूँ।)
मंत्र विधान (Mantras) - साधना की तीव्रता और मार्ग के अनुसार मंत्र का चयन करें। (रुद्राक्ष या काले हकीक की माला का प्रयोग करें)।
क. वैदिक/तांत्रिक बीज मंत्र (सर्वाधिक प्रचलित) - यह मंत्र सात्विक और तांत्रिक दोनों विधियों में सुरक्षित और प्रभावी है:
॥ ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं असितांग भैरवाय नमः ॥
(Om Hreem Hreem Hreem Asitanga Bhairavaya Namah)
ख. अघोर/तीक्ष्ण मंत्र (विशेष कार्य सिद्धि हेतु) -
॥ ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं असितांग भैरवाय, सर्व शाप विमोचनाय, मम कार्यं कुरु कुरु स्वाहा ॥
ग. शाबर मंत्र (ग्रामीण/कोल विधि) - शाबर मंत्रों में 'कीलन' नहीं होता, ये सीधे आदेश पर काम करते हैं। इसे गुरु आज्ञा से ही जपें। मंत्र गुरु मुख से प्राप्त करे।
शाबर विधि: इस मंत्र को किसी ग्रहण काल में 1008 बार जप करके सिद्ध कर लें। फिर प्रयोग के समय 21 बार जप कर झाड़ा लगाने से नजर दोष और ऊपरी बाधा हट जाती है।
असितांग भैरव कवच (संक्षिप्त) - साधना के दौरान सुरक्षा के लिए 'दिगबंधन' अत्यंत आवश्यक है।
“ॐ पूर्वस्यां असितांग भैरव रक्षतु (पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें)। आग्नेयां रुरु भैरव रक्षतु... ”
(यदि पूरा कवच याद न हो, तो केवल इतना बोलें: "ॐ असितांग भैरवाय मम रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा" और अपने चारों ओर जल की रेखा खींच दें।)
साधना के लाभ (Benefits) - ललित कला में सिद्धि: संगीत, लेखन, चित्रकला या किसी भी क्रिएटिव फील्ड में अद्भुत सफलता मिलती है।
शाप मुक्ति: यदि परिवार में कोई पितृ दोष या पुराना शाप चल रहा हो, तो असितांग भैरव की पूजा से वह नष्ट होता है।
वशीकरण (सात्विक): वाणी में ऐसा ओज आ जाता है कि सामने वाला व्यक्ति साधक की बात मानने को विवश हो जाता है।
गण: इनके गणों में मुख्य रूप से 'डाकिनी' और 'ब्रह्माणी शक्ति' की योगिनियां चलती हैं। इनकी सिद्धि से ये शक्तियां साधक की सहायता करती हैं।
चेतावनी और विशेष नियम-
भैरव साधना 'उग्र' मानी जाती है। साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करें।
साधना के बाद छोटे बालकों (बटुक रूप) या कुत्तों को भोजन अवश्य कराएं।
अहंकार का त्याग करें, क्योंकि हंस (विवेक) तभी आएगा जब अहंकार का कौआ उड़ जाएगा।
कोई भी साधना हो हमेशा गुरु के मार्गदर्शन में करना चाहिए यहा सिर्फ जानकारी हेतु बताया गया है ना कि आप इसको करने लगे
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