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विक्रमादित्य (विक्रमसेन) और शनिदेव कि कथा

उज्जयिनी नगरी के चक्रवर्ती सम्राट राजा विक्रमादित्य (विक्रमसेन) अपने न्याय और बुद्धि के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में नवरत्न शोभा पाते थे।



एक दिन राजदरबार में ग्रहों पर चर्चा छिड़ गई। विद्वान पंडित सूर्य के तेज, चन्द्रमा की शीतलता, मंगल के पराक्रम और बृहस्पति के ज्ञान की प्रशंसा कर रहे थे। जब बात शनिदेव की आई, तो राजा विक्रमादित्य ने नाक-भौं सिकोड़ ली। राजा ने अहंकारवश कहा, "अरे! शनि तो क्रूर है। वह केवल कष्ट देना जानता है। जिसका पैर टूट जाए, जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाए, समझो उस पर शनि की दशा है। मुझे देखो! मैं धर्म पर चलता हूँ, इसलिए मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अन्य ग्रह 'देवता' हैं, पर शनि तो केवल 'क्रूर ग्रह' है।"


राजा के ये शब्द वायुवेग से शनिदेव तक पहुँच गए। कर्मफलदाता को चुनौती मिल चुकी थी। उसी क्षण, आकाश मंडल में अंधकार छाया और दरबार के बीचों-बीच एक कृष्ण-वर्ण, तेजस्वी साधु प्रकट हुआ। उनकी आँखों में ऐसी गंभीरता थी जिसे देख बड़े-बड़े योद्धा कांप जाएं। वे स्वयं शनिदेव थे।

शनिदेव ने गंभीर स्वर में कहा, "राजन! तुम अपनी बुद्धि पर बहुत इतराते हो। तुम नहीं जानते कि देवराज इंद्र भी मेरे प्रभाव से नहीं बच सके। जब मेरी दृष्टि पड़ती है, तो रंक राजा बन जाता है और राजा रंक। तुमने मेरा अपमान किया है। अब तैयार हो जाओ, तुम्हारी साढ़ेसाती आरंभ होती है। देखते हैं तुम्हारा धर्म तुम्हें कैसे बचाता है।"

इतना कहकर शनिदेव अदृश्य हो गए।

कुछ समय बीता। एक दिन एक विदेशी सौदागर उज्जयिनी में आया। उसके पास दुनिया के सबसे सुंदर घोड़े थे। राजा विक्रमादित्य घोड़ों के पारखी थे। वे एक अत्यंत सुंदर काले घोड़े को परखने के लिए उस पर सवार हुए। जैसे ही राजा पीठ पर बैठे, घोड़ा हवा से बातें करने लगा। वह राजा को लेकर घने जंगलों में भाग गया और एक अनजान राज्य में जाकर राजा को पटक कर गायब हो गया। राजा विक्रमादित्य, जो कल तक सम्राट थे, अब फटे कपड़ों में, भूख-प्यास से व्याकुल एक अनजान नगर में भटक रहे थे। भटकते-भटकते राजा 'ताम्रलिंदा' नामक नगर में पहुँचे। वहाँ एक अमीर सेठ ने राजा की कुलीनता देखकर उसे अपनी दुकान पर पानी पिलाया और विश्राम करने को कहा। राजा दुकान के अंदर खूंटी पर अपना अंगोछा टांग कर लेट गए। उसी खूंटी पर सेठ का एक बेशकीमती मोतियों का हार टंगा था।

शनि की माया देखिए! राजा ने अपनी आँखों से देखा कि लकड़ी की खूंटी धीरे-धीरे उस हार को निगल रही है। कुछ ही देर में हार गायब हो गया।

जब सेठ लौटा और हार नदारद पाया, तो उसने शोर मचा दिया। "इस परदेसी ने मेरा हार चुराया है!"


राजा ने सच कहा, "खूंटी हार निगल गई," पर कौन विश्वास करता? मामला नगर के राजा के पास गया। शनि की दशा चल रही थी, बुद्धि सबकी विपरीत थी। नगर के राजा ने आदेश दिया— "इस चोर के हाथ और पैर काट दिए जाएं और इसे नगर के बाहर फेंक दिया जाए।" जिस राजा के इशारे पर सेनाएं चलती थीं, आज वह अपंग होकर सड़क किनारे पड़ा था। शरीर से रक्त बह रहा था, और लोग उसे घृणा से देख रहे थे।


तभी एक तेली (तेल निकालने वाला) का दिल पसीज गया। वह राजा को अपने घर ले आया। उसने राजा के घाव भरे और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया। राजा अब कोल्हू के बैल की जगह बैठकर, अपनी बची हुई शक्ति से कोल्हू घुमाता और तेल निकालता। राजा विक्रमादित्य ने इस कष्ट में भी धैर्य नहीं खोया। वे समझ गए थे कि यह शनिदेव का न्याय है। वे मन ही मन गाते—

"हे प्रभु! यह मेरे कर्मों का फल है या तुम्हारी परीक्षा, मैं इसे स्वीकार करता हूँ।"

दिन भर कोल्हू चलाना और रात को दीपक की लौ में ईश्वर का ध्यान करना—यही उनका जीवन बन गया। एक रात, उन्होंने 'दीपक राग' गाया। उनका स्वर इतना पवित्र और दर्द भरा था कि पूरे नगर के बुझे हुए दीपक अपने आप जल उठे। 


दीपक राग सुनकर और राजा का धैर्य देखकर शनिदेव का हृदय पिघल गया। वे पुनः प्रकट हुए। शनिदेव बोले, "राजन! तुम्हारे धैर्य और सत्य ने मुझे प्रसन्न किया। तुमने दुख में भी परमात्मा और धर्म को नहीं छोड़ा। मांगों क्या मांगते हो?" राजा विक्रमादित्य ने, जिनके हाथ-पैर कटे हुए थे, गिड़गिड़ाते हुए कहा, "हे सूर्यपुत्र! आपने मुझे जो कष्ट दिया, सो दिया। लेकिन मेरी एक प्रार्थना है— जैसा कष्ट आपने मुझे दिया, वैसा किसी और को मत देना। साधारण मनुष्य में इतना सामर्थ्य नहीं होता कि वह यह सब सह सके। वह टूट जाएगा।" राजा की परोपकारिता देखकर शनिदेव गदगद हो गए।

"तथास्तु!" शनिदेव ने कहा। "जो मेरी कथा सुनेगा, जो अहंकार त्यागेगा और शनिवार को मेरा स्मरण करेगा, उसे मैं कभी ऐसा कष्ट नहीं दूँगा।"

देखते ही देखते, राजा के हाथ-पैर जुड़ गए। शरीर पहले से अधिक कांतिवान हो गया। वह खूंटी जिसने हार निगला था, उसने सबके सामने हार उगल दिया। सेठ लज्जित हुआ और अपनी कन्या का विवाह राजा विक्रमादित्य से कर दिया।

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