भारतीय भक्ति परंपरा में कई ऐसे ग्रंथ और स्तुतियाँ हैं, जो केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि जीवंत अनुभव और आस्था की गहराई को दर्शाते हैं। उन्हीं में से एक है हनुमान बाहुक, जिसकी रचना महान संत गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। यह रचना केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक पीड़ित भक्त की करुण पुकार और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है।
📖 उत्पत्ति की मार्मिक कथा - कहा जाता है कि अपने जीवन के अंतिम चरण में, जब तुलसीदास जी वाराणसी (काशी) में निवास कर रहे थे, तब उन्हें भयंकर शारीरिक कष्ट का सामना करना पड़ा।
- 👉 उनके दाहिने हाथ (भुजा) में अत्यंत तीव्र दर्द, सूजन और फोड़े-फुंसियाँ हो गई थीं।
- 👉 यह दर्द इतना असहनीय था कि वे न ठीक से सो पा रहे थे, न बैठ पा रहे थे और न ही लिखने की स्थिति में थे।
- 🩺 कई औषधियों और उपचारों का सहारा लेने के बाद भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। विद्वानों के अनुसार, यह कष्ट उनके प्रारब्ध कर्म या कलियुग के प्रभाव का परिणाम माना जाता है।
🙏 भक्ति की ओर अंतिम आश्रय - जब हर उपाय विफल हो गया, तब तुलसीदास जी ने अपने इष्ट देव भगवान हनुमान का स्मरण किया।
🔸 वे जानते थे कि हनुमान जी संकटमोचन हैं
🔸 वे भक्तों के हर दुख और संकट को हरने वाले हैं
अपनी असहनीय पीड़ा के बीच उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में 44 पदों की रचना की — जिसे आज हम हनुमान बाहुक के नाम से जानते हैं।
✍️ ‘हनुमान बाहुक’ नाम का अर्थ
📌 “बाहुक” शब्द “बाहु” (भुजा/हाथ) से लिया गया है।
👉 चूँकि यह रचना विशेष रूप से भुजा के दर्द से मुक्ति पाने के लिए की गई थी, इसलिए इसका नाम हनुमान बाहुक पड़ा।
🌟 चमत्कारी परिणाम की मान्यता - मान्यता है कि जैसे ही तुलसीदास जी ने इस स्तुति को पूर्ण किया:
✨ उनकी भुजा का दर्द धीरे-धीरे समाप्त होने लगा
✨ शरीर के घाव भरने लगे
✨ वे पुनः स्वस्थ हो गए
यह घटना भक्ति की शक्ति और हनुमान जी की कृपा का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।
🔱 हनुमान बाहुक का आध्यात्मिक महत्व - आज भी हनुमान बाहुक का पाठ अत्यंत प्रभावशाली और चमत्कारी माना जाता है। इसे विशेष रूप से निम्न कारणों से पढ़ा जाता है:
🩺 1. शारीरिक रोगों से मुक्ति
- गठिया (arthritis)
- वात रोग
- पुराने दर्द
- मांसपेशियों और जोड़ों की समस्या
👉 नियमित पाठ से मानसिक शांति और आत्मबल बढ़ता है।
🛡️ 2. नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा
- ऊपरी बाधाओं से बचाव
- नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम करना
- भय और चिंता को दूर करना
💖 3. अटूट विश्वास और भक्ति का प्रतीक
- यह रचना सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा में अपार शक्ति होती है
- कठिन समय में ईश्वर ही अंतिम सहारा होते हैं
🧘♂️ 4. मानसिक शांति और आत्मबल
- मन को स्थिर करता है
- तनाव और चिंता को कम करता है
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है
📿 पाठ करने की विधि (सरल तरीका)
- 👉 सुबह या शाम शांत मन से बैठें
- 👉 हनुमान जी का ध्यान करें
- 👉 श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करें
- 👉 नियमितता बनाए रखें
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श्री हनुमान बाहुक पाठ – Sri Hanuman Bahuk
श्रीगणेशाय नमः श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीमद्-गोस्वामी तुलसीदास-कृत
॥ छप्पय ॥
सिधु-तरन, सिय-सोच हरन, रबि-बालबरन-तनु । भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ॥ गहन-दहन-निरदहन-लक निःसक, बक-भुव । जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ॥ कह तुलसिदास सेवत सुलभ, सेवक हित सन्तत निकट। गुनगनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-सकट-बिकट ॥१॥
स्वर्न-सैल सकास कोटि-रबि-तरुन तेज घन। उर बिसाल, भुज दण्ड चण्ड नख बज्र बज्रतन ॥ पिग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन। कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल-बल-भानन ॥ कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट। सताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहुँ नहि आवत निकट ॥२॥
॥ झूलना ॥
पञ्चमुख छमुख भृगुमुख्य भट-असुर-सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो। बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बदी बदत पैजपूरो ॥ जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो। दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है पवन को पूत रजपूत रुरो ॥३॥
॥ घनाक्षरी ॥
भानुंसो पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो। पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रमको न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो ॥ कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकांचौधी चित्तनि खभार सो। बल कैंधौ बीररस, धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो ॥४॥
भारत में पारथ के रथ केतु कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हलबल भो। कह्यो द्रोन भीषम समीरसुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥ बानर सुभाय बालकेलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँगहुँतें घाटि नभतल भो। नाइ-नाइ माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ॥५॥
गोपद पयोधि करि होलिका ज्यौ लाई लक, निपट निंसक परपुर गलबल भो। द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यो कपिखेल बेल कैसो फल भो॥ 'सकटसमाज असंमजस भो रामराज, काज जुग-पूगनिको करतल पल भो। साहसी समत्थ तुलसीको नाह जाकी बाँह, लोक पाल पालन को फिर थिर थल भो ॥६॥
कमठकी पीठि जाके गोड़निकी गाड़ें मानो, नापके भाजन भरि जलनिधि-जल भो। जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीनबास तिमि तोमनिको थल भो ॥ कुम्भकर्न-रावन-पयोदनाद ईधनको, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो। भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान-सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ॥७॥
दूत रामरायको, सपूत पूत पौनको, तू, अजनीको नन्दन प्रताप भूरि भानु सो। सीय-सोच-समन, दुरित-दोष-दमन, सरन आये अवन, लखनप्रिय प्रान सो ॥ दसमुख दुसह दरिद्र दरिबेको भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो। ज्ञान-गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ॥८॥
दवन-दुक्न-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बदीछोर को। पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को ॥ लोक-परलोकतें बिसोक सपने न सोक, तुलसीके हिये है भरोसो एक ओरको। रामको दुलारो दास बामदेवको निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी किसोरको ॥९॥
महाबल-सीम, महाभीम, महाबानइत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को। कुलिस-कठोरतनु जोरपरैरे रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीरको ॥ दुर्जनको कालसो कराल पाल सज्जनको, सुमिरे हरनहार तुलसीकी पीरको। सीय-सुखदायक दुलारो रघुनायकको, सेवक सहायक है साहसी समीर को ॥१०॥
रचिबेको बिधि जैसे, पालिबेको हरि, हर, मीच मारिबेको, ज्याइबेको सुधापान भो। धरिबेको धरनि, तरनि तम दलिबेको, सोखिबे कृसानु, पोषिबेको हिम-भानु भो ॥ खल-दुःख-दोषिबेको, जन-परितोषिबेको, माँगिबो मलीनताको मोदक सुदान भो। आरतकी आरति निवारिबेको तिहुँ पुर, तुलसीको साहेब हठीलो हनुमान भो ॥११॥
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँकको। देवी देव दानव दयावने है जोरें हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँकको॥ जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताकै जो अनर्थ सो समर्थ एक आँकको। सब दिन रूरो परे पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँकको ॥१२॥
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी। लोक परलोकको बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी॥ केसरीकिसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधानकी। बालक-ज्यो पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमानकी ॥१३॥
करुना निधान, बलबुद्धिके निधान, मोद-महिमानिधान, गुन-ज्ञानके निधान हौ। बामदेव-रूप, भूप राम के सनेही, नाम, लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ॥ आपने प्रभाव, सीतानाथके सुभाव सील, लोक-बेद-बिधिके बिदुष हनुमान हौ। मनकी, बचनकी, करमकी तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ॥ १४॥
मनको अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराजके समाज साज साजे हैं। देव-बदीछोर रनरोर केसरीकिसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं। बीर बरजोर, घटि जोर तुलसीकी ओर, सुनि सकुचाने साधु खलगन गाजे हैं। बिगरी सँवार अजनीकुमार कीजे मोहि, जैसे होत आये हनुमानके निवाजे हैं॥ १५॥
॥ सवैया ॥
जानसिरोमनि हौ हनुमान सदा जनके मन बास तिहारो। ढारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हो तो तिहारो ॥ साहेब सेवक नाते ते हातो कियो सो तहाँ तुलसीको न चारो। दोष सुनाये तें आगेहुँको होशियार है हो मन तौ हिय हारो॥१६॥
तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे उर घाले। तेरे निवाजे गरीबनिवाज बिराजत बैरिनके उर साले ॥ 'सकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरीके से जाले। बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ॥ १७ ॥
सिधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लक से बक मवा से। तै रन-केहरि केहरिके बिदले अरि-कुजर छैल छवा से॥ तोसो समत्थ सुसाहेब सेइ सहै तुलसी दुख दोष दवासे। बानर बाज बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यौ न लपेटि लवा-से॥१८॥
अच्छ-बिमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भान निहारो। बारिदनाद अंक पन कुंभकरन्न से कुजर केहरि-बारो॥ राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीरदुलारो। पापते, सापतें, ताप तिहूँतें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो॥१९॥
॥ घनाक्षरी ॥
जानत जहान हनुमानको निवाज्यौ जन, मन अनुमानि, बलि, बोल न बिसारिये। सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ॥ अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो, ताहि माहुर न मारिये। साहसी समीरके दुलारे रघुबीरजूके, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥ २०॥
बालक बिलोकि, बलि, बारेतें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्ही निरुपाधि न्यारिये। रावरो भरोसो तुलसीके, रावरोई बल, आस रावरीयै, दास रावरो बिचारिये ॥ बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलिको, निहारि सो निवारिये। केसरीकिसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बाँहुपीर राहुमातु ज्यौ पछारि मारिये ॥ २१॥
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरीकुमार बल आपनो सँभारिये। राम के गुलामनिको कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरेको तकिया तिहारिये ॥ साहेब समर्थ तोंसो तुलसीके माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये। पोखरी बिसाल बाँहु, बलि बारिचर पीर, मकरी ज्यौ पकरिकै बदन बिदारिये ॥२२॥
रामको सनेह, राम साहस लखन सिय, रामकी भगति, सोच सकट निवारिये। मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामंवतको भरोसो तेरो भारिये ॥ कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठिकै बिचारिये। महाबीर बाँकुरे बराकी बाँहपीर क्यौ न, लकिनी ज्यौ लातघात ही मरोरि मारिये ॥ २३॥
लोक-परलोकहूँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये। कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ॥ खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखियत भारिये। बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ॥२४॥
करम-कराल-कंस भूमिपालके भरोसे, बकी बकभगिनी काहूतें कहा डरेगी। बड़ी बिकराल बालघातिनी न जात कहि, बाँहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥ आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनीके पाले परेगी। पूतना पिसाचिनी ज्यौ कपिकान्ह तुलसीकी, बाँहपीर महाबीर, तेरे मारे मरैगी ॥ २५॥
भालकी कि कालकी कि रोषकी त्रिदोषकी है, बेदन बिषम पाप-ताप छलछाँहकी। करमन कूटकी कि जन्त्र मन्त्र बूटकी, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँहकी ॥ पैहहि सजाय नत कहत बजाय तोहि, बावरी न होहि बानि जानि कपिनाँहकी। आन हनुमानकी दोहाई बलवानकी, सपथ महाबीरकी जो रहे पीर बाँहकी ॥ २६॥
सिहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है। लक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है॥ तोरि जमकातरि मदोदरी कढ़ोरि आनी, रावनकी रानी मेघनाद महँतारी है। भीर बाँहपीरकी निपट राखी महाबीर, कौनके सकोच तुलसीके सोच भारी है॥२७॥
तेरो बालकेलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीरसुधि सक्र-रबि-राहुकी। तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहे आरति न काहुकी ॥ साम दाम भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथहीके चोटी चोर साहुकी। आलस अनख परिहासकै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसीके बाहुकी ॥२८॥
टूकनिको घर-घर डोलत कंगाल बोलि, बाल ज्यो कृपाल नतपाल पालि पोसो है। कीन्ही है सँभार सारं अजनीकुमार बीर, आपनो बिसारिहें न मेरेहू भरोसो है ॥ इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कंहौ को तिलोक तोसो है। सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरीको मरन खेल बालकनिको सो है ॥२९॥
आपने ही पापतें त्रितापतें कि सापतें, बढ़ी है बाँहबेदन कही न सहि जाति है। औषध अनेक जन्त्र-मन्त्र-टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ॥ करतार, भरतार, हरतार, कर्म, काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है। चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो रामदूत, ढील तेरी बीर मोहि पीरतें पिराति है॥३०॥
दूत रामरायको, सपूत पूत बायको, समत्थ हाथ पायको सहाय असहायको। बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिकाके घायको ॥ एते बड़े साहेब समर्थको निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन कायको। थोरी बाँहपीरकी बड़ी गलानि तुलसीको, कौन पाप कोप, लोप प्रगट प्रभाय को॥३१॥
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं। पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, रामदूतकी रजाइ माथे मानि लेत हैं। घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं। क्रोध कीजे कर्मको प्रबोध कीजे तुलसीको, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥३२॥
तेरे बल बानर जिताये रन रावनंसो, तेरे घाले जातुधान भये घर-घरके। तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबरके ॥ तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हरके। तुलसी के माथेपर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसे कनिगरके ॥ ३३॥
पालो तेरे टूकको परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूकों हौ आपनी ओर हेरिये। भोरानाथ भोरेही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अवडेरिये ॥ 'अबु तू हौं अबुचर, अबु तू हौ डिंभ, सो न, बूझिये बिंलब अवंलब मेरे तेरिये। बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसीकी बाँह पर लामीलूम फेरिये ॥३४॥
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौ, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है। बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष, धूम-मूल मलिनाई है॥ करुनानिधान हनुमान महाबलवान, हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजें तें उड़ाई है। खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरीकिसोर राखे बीर बरिआई है ॥ ३५॥
॥ सवैया ॥
रामगुलाम तुही हनुमान गोसाँइ सुसाँइ सदा अनुकूलो। पाल्यों हौ बाल ज्यो आखर दू पितु मातु सों मगल मोद समूलो ॥ बाँहकी बेदन बाँहपगार पुकारत आरत आनँद भूलो। श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौ दरबार परो लटि लूलो ॥३६॥
॥ घनाक्षरी ॥
कालकी करालता करम कठिनाई कींधौ, पापके प्रभावकी सुभाय बाय बावरे। बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डावरे ॥ लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सीचिये मलीन भो तयो है तिहूँ तावरे। भूतनिकी आपनी परायेकी कृपानिधान, जानियत सबहीकी रीति राम रावरे ॥ ३७ ॥
पाँयपीर पेटपीर बाँहपीर मुँहपीर, जरजर सकल सरीर पीरमई है। देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहिपर दवरि दमानक सी दई है। 'हो तो बिन मोलके बिकानो बलि बारेही तें, ओट रामनामकी ललाट लिखि लई है। कुंभज के किंकर बिकल बूड़े गोखुरनि, हाय रामराय ऐसी हाल कहूँ भई है ॥३८॥
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर-केतुजा कुरोग जातुधान है। राम नाम जगजाप कियो चंहो सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है॥ सुमिरे सहाय रामलखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान है। तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट, बेधे बरगदसे बनाइ बानवान हैं॥३९॥
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, रामनाम लेत माँगि खात टूकटाक हौ। पर्यो लोकरीतिमें पुनीत प्रीति रामराय, मोहबस बैठो तोरि तरकितराक हौ ॥ खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अजनीकुमार सोध्यो रामपानि पाक हौ। तुलसी गोसाइँ भयों भोड़े दिन भूलि गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौ ॥४०॥
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय-हाय को। तुलसी अनाथसो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सीलसिधु आपने सुभायको ॥ नीच यहि बीच पति पाइ भरुहाइगो, बिहाइ प्रभु-भजन बचन मन काय को। तातें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि-फूटि निकसत लोन रामरायको ॥४१॥
जिंओ जग जानकीजीवनको कहाइ जन, मरिबेको बारानसी बारि सुरसरि को। तुलसीके दुहूँ हाथ मोदक है ऐसे ठाउँ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरिको॥ मोको झूठो साँचो लोग रामको कहत सब, मेरे मन मान है न हरको न हरिको। भारी पीर दुसह सरीरतें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करिको ॥४२॥
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेसको महेस मानो गुरु कै। मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर में न जाने सुरकै ॥ ब्याधि भूतजनित उपाधि काहू खलकी, समाधि कीजे तुलसीको जानि जन फुरकै। कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोगसिधु क्यो न डारियत गाय खुरकै ॥४३॥
कंहो हनुमानंसो सुजान रामरायंसो, कृपानिधान सकरंसो सावधान सुनिये। हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरंचि सब देखियत दुनिये ॥ माया जीव कालके करमके सुभायके, करैया राम बेद कहें साँची मन गुनिये। तुम्हतें कहा न होय हाहा सो बुझेये मोहि, हौ हूँ रहो मौन ही बयो सो जानि लुनिये ॥४४॥
📌 विशेष: मंगलवार और शनिवार को पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है।
🔔 निष्कर्ष - हनुमान बाहुक केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक जीवंत उदाहरण है कि जब मनुष्य की सारी शक्तियाँ समाप्त हो जाती हैं, तब सच्ची भक्ति ही उसका सहारा बनती है।
👉 गोस्वामी तुलसीदास की यह रचना हमें सिखाती है कि श्रद्धा, विश्वास और भक्ति से हर पीड़ा का अंत संभव है।
✨ यदि मन में सच्ची आस्था हो, तो भगवान हर संकट को दूर करने का मार्ग स्वयं बना देते हैं। ✨
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