जब तक मन हर बात में "मैं" और "मेरा" को पकड़कर बैठा रहता है, तब तक शांति केवल एक इच्छा बनी रहती है।
मनुष्य अपने विचारों, सफलताओं, ज्ञान और पहचान से इतना जुड़ जाता है कि धीरे-धीरे वही उसका अहंकार बन जाता है। फिर हर बात स्वयं को सही सिद्ध करने की लड़ाई बन जाती है। ऐसे मन में न स्थिरता टिकती है, न शांति। साधना का उद्देश्य केवल नाम का उच्चारण करना नहीं, बल्कि उस "मैं" की पकड़ को धीरे-धीरे ढीला करना भी है।
जैसे-जैसे नाम जप गहराता है, साधक स्वयं को विचारों से अलग देखना शुरू करता है। वह समझने लगता है कि क्रोध, भय, मोह और अहंकार उसके वास्तविक स्वरूप नहीं हैं। यही जागरूकता साक्षी भाव को जन्म देती है और भीतर एक ऐसी शांति का अनुभव होने लगता है जो परिस्थितियों के बदलने से भी समाप्त नहीं होती।
यदि आप केवल मंत्र याद करना नहीं, बल्कि साधना की गहराई को समझना चाहते हैं, तो यह Website आपके लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है। इसमें नाम जप से आजपा तक की यात्रा, श्वास साधना, संस्कारों का क्षय, साक्षी भाव, अहंकार का विसर्जन, चक्रों पर नाम का प्रभाव, अनहद नाद, शून्यता और साधना के 21 गहरे चरण को सरल और व्यावहारिक भाषा में समझाया गया है।
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