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छाया पुरुष क्या है, इसकी सिद्धि कैसे करें? और इससे काम लेने के बाद इसे नष्ट कैसे करें...



 प्रश्न: "छाया पुरुष क्या है, इसकी सिद्धि कैसे करें? और इससे काम लेने के बाद इसे नष्ट कैसे करें? धन्यवाद।"

उत्तर:देखिए, आपने जो प्रश्न पूछा है, वह गूढ़ तांत्रिक साधनाओं के सबसे गोपनीय और ख़तरनाक कोनों में से एक पर है। मैं बिना किसी रहस्य-रोमांच के, बहुत सीधे और साफ शब्दों में उत्तर दूँगा, क्योंकि इस विषय पर "जिज्ञासा" और "प्रयोग" के बीच की रेखा बहुत पतली है, और इसे पार करने का मूल्य बहुत भारी है।


1. छाया पुरुष क्या है?

सरल शब्दों में, यह साधक की अपनी छाया यानी परछाईं को एक सूक्ष्म, स्वतंत्र इकाई के रूप में सिद्ध करना है। तंत्र-ग्रंथों में इसे "छाया पुरुष सिद्धि" कहा गया है। साधक अपने सूक्ष्म शरीर, प्राण ऊर्जा और मानसिक संकल्प के बल पर अपनी छाया में एक कृत्रिम "सूक्ष्म-देह" का निर्माण करता है, जो उसकी आज्ञा पर काम कर सके, जैसे दूर-दराज की सूचना लाना, वस्तुएँ सरकाना, या अन्य अदृश्य कार्य। यह कोई स्वतंत्र आत्मा नहीं, बल्कि साधक की ही ऊर्जा का एक अंश है, जिसे एक विशेष आकार और आदेश दिया जाता है।


2. इसकी सिद्धि कैसे करें? — मेरा स्पष्ट उत्तर: मत करें।

जो ग्रंथ इस विद्या का वर्णन करते हैं, जैसे कुछ वाम तंत्र या शिव स्वरोदय के अप्रचलित भाग, वे भी भयानक शर्तें रखते हैं। बिना पूर्ण गुरु के, बिना पहले शरीर और मन की पूर्ण शुद्धि के, यह साधना करना "प्राण-संकट" और "मानसिक विनाश" का द्वार है। सिद्धि के लिए वर्षों तक एकांत में अंधकार-कक्ष में बैठकर, विशेष प्राणायाम और मंत्र-जप द्वारा छाया पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जब तक छाया "जीवित" प्रतीत न होने लगे। पर इस दौरान क्या होता है?


  • आपके सूक्ष्म और स्थूल शरीर के बीच का सुरक्षा-कवच जानबूझकर तोड़ा जाता है।
  • आपकी छाया में जो सूक्ष्म-देह बनता है, वह आपका ही विक्षेप है। यदि आपका कोई दबा हुआ क्रोध, भय या वासना बची रही, और अवश्य रहेगी, तो वह छाया पुरुष उन्हीं दोषों को बड़ा करके आप पर ही पलटेगी।
  • जिसे आप सेवक बना रहे हैं, वही एक दिन आपका स्वामी बन जाएगा, यह सैकड़ों बिखरे साधकों का अनुभव है।


3. इसे नष्ट कैसे करें?

यह प्रश्न ही सबसे बड़ी चेतावनी है। यदि कोई व्यक्ति बिना पूर्णता के ऐसी छाया-सिद्धि कर लेता है, तो उसे नष्ट करना लगभग असंभव हो जाता है। वह छाया आपकी ही ऊर्जा है, इसलिए वह आपके ही मन और प्राण पर पलती रहती है। मारण-प्रयोग स्वयं पर करने जैसा है। जो ज्ञानी पुरुष ऐसी स्थिति में किसी की सहायता करते हैं, वे मुख्यतः तीन उपाय करते हैं:

  • साधक का दीक्षा-संस्कार कर उसे पूर्ण रूप से शरणागत करना, ताकि उसकी इच्छा-शक्ति ही समाप्त हो जाए और छाया को भोजन न मिले।
  • तीव्र सात्विक हवन और रक्षा-मंत्रों द्वारा साधक की ऊर्जा को पुनः स्थूल शरीर में स्थापित करना।
  • स्वयं साधक का पूर्ण समर्पण, यह पहचानकर कि "मैं कर्ता हूँ ही नहीं", धीरे-धीरे छाया के अस्तित्व को भुखमरी से मिटाना।

पर यह वर्षों की प्रक्रिया है, और बहुत बार असफल होती है, जिसका परिणाम साधक की मानसिक स्थायी विकृति या आकस्मिक मृत्यु तक होता है। अगर आप इसके पीछे का विज्ञानं समझना चाहते हैँ तो आत्म सम्मोहन द्वारा इच्छा पूर्ति का विज्ञानं पुस्तक पढ़िए  जिसमे विस्तार से मन के रहस्य समझाये गए है 


मेरी सीधी सलाह:

इस विद्या को "रोचक जानकारी" के रूप में भी मन में जगह न दें। जिस प्रकार मृत्यु के प्रयोग और सूक्ष्म शरीर की यात्राओं के ख़तरों पर चेतावनी दी जाती है, ठीक उसी प्रकार यह "छाया पुरुष" उस खेल का सबसे भयानक छोर है। यह सिद्धि नहीं, आत्म-प्रताड़ना है। सहज जीवन, सजग साधना, और अपने इष्टदेव का नाम, यही सर्वोच्च सिद्धि है, और सबसे सुरक्षित भी।

यदि कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में फँस चुका है, तो तुरंत किसी सिद्ध गुरु की शरण लें, अहंकार छोड़ें, और अपने इष्ट का नाम पकड़ लें, क्योंकि उस परम नाम से बड़ी कोई शक्ति नहीं जो इसे नष्ट कर सके।

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