प्रभु प्राण नाथमं विभुमं विश्वनाथमं जगन्नाथनाथमं सदानंद भाजमं भवब्दभवय भूतेश स्वयं भूतनाथम् शिवमं शंकरं शंभूमिशम नमामि।।
यह पावन मंत्र भगवान शिव की स्तुति में रचा गया है, जिसमें उनके दिव्य, कल्याणकारी और सर्वव्यापी स्वरूप की महिमा गाई गई है।
इस मंत्र के प्रत्येक पद का भावार्थ निम्नलिखित है:
- प्रभु प्राण नाथमं विभुमं: जो संपूर्ण सृष्टि और हमारे प्राणों के स्वामी हैं, जो सर्वव्यापी (सब जगह विद्यमान) हैं।
- विश्वनाथमं जगन्नाथनाथमं: जो इस संपूर्ण विश्व के नाथ (स्वामी) हैं और जगत के स्वामियों के भी नाथ हैं।
- सदानंद भाजमं: जो सदा परम आनंद (सच्चिदानंद) के स्वरूप में विराजमान रहते हैं।
- भवब्दभवय भूतेश स्वयं: जो संसार रूपी सागर से तारने वाले हैं, सभी जीवों और भूतों के स्वामी (भूतेश) हैं और स्वयं ही प्रकट (स्वयंभू) हुए हैं।
- भूतनाथम् शिवमं शंकरं शंभूमिशम नमामि: ऐसे संपूर्ण प्राणियों के रक्षक, परम कल्याणकारी, आनंद प्रदान करने वाले, भगवान शिव और सर्वशक्तिमान ईश्वर शंभू को मैं नमन (प्रणाम) करता हूँ।
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सरल अर्थ:
>"जो संपूर्ण सृष्टि और प्राणों के स्वामी हैं, जो सर्वव्यापी हैं, जो इस जगत और जगत के सभी स्वामियों के नाथ हैं, जो सदा परम आनंद में लीन रहते हैं, जो संसार के भवसागर से पार लगाने वाले हैं, जो समस्त जीवों व भूतों के स्वामी तथा स्वयं प्रकट हुए हैं—ऐसे कल्याणकारी, सुखदाता, और सर्वेश्वर भगवान शिव (शंभू) के चरणों में मैं बारंबार नमन करता हूँ।"
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